मां का दिल
हैलो मां मै अमन बोल रहा हूं, कैसी हो मां.?
मां- मैं ठीक हूँ बेटे, तुम और बहू कैसे हो?
अमन- मां हम दोनों भी ठीक है।
अमन- मां आपकी बहुत याद आ रही है इसलिए मैं .तुम्हें लेने अगले महीने इंडिया आ रहा हूँ।
मां- क्या तुम सच बोल रहे हो?
अमन- हाँ माँ, अब हम सब एकसाथ ही रहेंगे।
अमन- आपकी बहु बोल रही थी मां को दुबई ले आओ वहां अकेली बहुत परेशान हो रही होंगी।
अमन- हैलो तुम सुन रही हो ना माँ. ?
मां- हाँ बेटे...",मां की आंखो से खुशी के आंसुओं की धारा बह निकली, बेटे और बहू का प्यार उसकी नस-नस में दौड़ने लगा।
जीवन के 70 साल गुजार चुकी सरितादेवी ने जल्दी से अपने पल्लू से आंसू पोंछे और बेटे से बात करने लगी।
पूरे 3 साल बाद बेटा घर आ रहा था।
बूढ़ी सावित्री ने मोहल्ले भर मे दौड़ दौड़ कर ये खबर सबको सुना दी।
सभी खुश थे की चलो बुढ़ापा चैन से बेटे और बहू के साथ गुजर जाएगा।
अमन अकेला आया था, उसने कहा की माँ हमे जल्दी ही वापिस जाना है इसलिए जो भी💷 रुपया पैसा किसी से लेना है वो लेकर रखलों और तब तक मे किसी प्रोपेर्टी डीलर से मकान की बात करता हूँ।
"मकान...?", माँ ने पूछा। हाँ माँ,अब ये मकान बेचना पड़ेगा वरना कौन इसकी देखभाल करेगा।
हम सबतो अब दुबई मे ही रहेंगे।बूढ़ी आंखो ने मकान के कोने कोने को ऐसे निहारा जैसे किसी अबोध बच्चे को सहला रही हो।
आनन फानन और औने-पौने दाम मे अमन ने मकान बेच दिया।
सावित्री देवी ने वो जरूरी सामान समेटा जिस से उनको बहुत ज्यादा लगाव था।
अमन टैक्सी मँगवा चुका था। एयरपोर्ट पहुँचकर अमन ने कहा,"माँ तुम यहाँ बैठो मे अंदर जाकर सामान की जांच और बोर्डिंग और विजा का काम निपटा लेता हूँ।
""ठीक है बेटे।",सावित्री देवी वही पास की बेंच पर बैठ गई।
काफी समय बीत चुका था। बाहर बैठी सावित्री देवी बार बार उस दरवाजे की तरफ देख रही थी जिसमे अमन गया था लेकिन अभी तक बाहर नहीं आया।'
शायद अंदर बहुत भीड़ होगी...',सोचकर बूढ़ी आंखे फिर से टकट की लगाए देखने लगती।
अंधेरा हो चुका था। एयरपोर्ट के बाहर गहमा-गहमी कम हो चुकी थी।
"माजी...,किस से मिलना है?", एक कर्मचारी ने वृद्धा से
पूछा ।
"मेरा बेटा अंदर गया था.....टिकट लेने,वो मुझे दुबई लेकर जा रहा है ....",
सावित्रीदेवी ने घबराकर कहा।
"लेकिन अंदर तो कोई पैसेंजर नहीं है, दुबई जाने वाली फ्लाइट तो दोपहर मे ही चली गई। क्या नाम था आपके बेटे का?" ,कर्मचारी ने सवाल किया।
"और....अमन. ...", सावित्री के चेहरे पे चिंता की लकीरें उभर आई।
कर्मचारी अंदर गया और कुछ देर बाद बाहर आकर बोला,"मांजी....
आपका बेटा अमन तो दुबई जाने वाली फ्लाइट से कब का जा चुका...।""क्या. ? "
वृद्धा कि आंखो से आंसुओं का सैलाब फुट पड़ा।
बूढ़ी मां का रोम रोम कांप उठा। किसी तरह वापस घर पहुंची जो अब बिक चुका था।
रात में घर के बाहर चबूतरे पर ही सो गई। सुबह हुई तो दयालु मकान मालिक ने एक कमरा रहने को दे दिया।
पति की पेंशन से घर का किराया और खाने का काम चलने लगा।
समय गुजरने लगा। एक दिन मकान मालिक ने से पूछा।
"मांजी... क्यों नही आप अपने किसी रिश्तेदार के यहां चली जाए,अब आपकी उम्र भी बहुत हो गई, अकेली कब तक रह पाएंगी।"
"हां,चली तो जांऊ,लेकिन कल को मेरा बेटा आया तो..?, यहां फिर कौन उसका ख्याल रखेगा?"......
आंख से आंसू आने लग गए दोस्तों ....! प्लीज अपने मां-बाप का दिल कभी न दुखाएं।
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