सूचना का
अधिकार
आज अगर हम किसी से पूछते हैं कि आप अपने आपको भारत
का कैसा नागरिक मानते हैं तो ज्यादातर का जवाब होता है कि हम अपने आपको देश के
बहुत बड़े जागरूक नागरिक मानते है लेकिन उनसे मेरा एक सवाल हैं कि क्या वो या हम
वाकई जागरूक नागरिक है? लेकिन अगर हम पुराने समय पर नजर डालेंगे और इतिहास का विश्लेषण करेंगे तो
पायेंगे कि हम यानी इस देश के नागरिक ना पहले जागरूक थे, ना ही
आज के समय में जागरूक है|
अगर हम सच में ही जागरूक होते तो शायद ही भारत कभी
गुलाम होता| जब देश पर
बाहरी आक्रमण हुए तब हमारे देश की जनता निष्क्रिय रही, क्योंकि
उसे लगता था कि आक्रमण शासन के लिए शासक पर किया गया है| और
शासक कोई भी उसे क्या फर्क पड़ने वाला है| हमारे यहाँ का नागरिक
शासकों के मामले में इतना ही सोचता आया कि यह शासक नहीं तो वह सही, हमें तो मेहनत ही करनी है| और इसी का नतीजा था कि 1857
में जब भारत के स्थानीय शासकों ने जब अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र
क्रांति की, तब जनता जागरूकता के अभाव में अंग्रेजों को
भगाने में सक्रीय नहीं हुई| और नतीजा वह क्रांति फ़ैल हो गई
और देश गुलामी की जंजीरों से जकड़ गया|
1857 क्रांति जनता की नजर में
स्थानीय शासकों का अपना शासन बचाने का प्रयास मात्र था, अत:
वह स्थानीय शासकों के साथ क्रांति में भागीदार ही नहीं रही| स्थानीय
शासकों की भी कमी थी कि वे जनता को अंग्रेजों के खिलाफ जागरूक ही नहीं कर पाये,
ना उन्होंने कोशिश की|
जब बापू (महात्मा गाँधी) ने जनता को बताया कि वे
अंग्रेजों के गुलाम है और जनता को जागरूक किया कि इन विदेशी शासकों को भगाकर जनता
लोकतंत्र के रूप में आजाद हो सकती है|
लोकतंत्र में जनता का राज होगा, वह खुद अपना
शासक अपने बीच से चुनेगी|
जनता जागरूक हुई और उन अंग्रेजों को बिना जंग किये, बिना लाठी-डंडा चलाये भगा दिया
जिनको कभी देश के बहुत सारे शासक हथियारों के बल पर नहीं भगा पाये| लेकिन महात्मा गाँधी ने जनता को इतना ही जागरूक किया था कि इन गोरे अंग्रेजों
से सत्ता छीनकर कांग्रेस रूपी काले अंग्रेजों को दे दो, और
जनता ने दे दी| कांग्रेस या अन्य लोकतांत्रिक दलों को सत्ता
देकर जनता फिर सो गई| कभी जागरूक रहकर यह देखने की कोशिश भी
नहीं की कि हमने जिनको राज दिया है वे ठीक ढंग से काम कर भी रहे है या नहीं और
नतीजा आपके सामने है- हमारे जागरूक नहीं रहने के कारण देश में अरबों रूपये के घोटाले
हो गए, घोटालों से जमा किया धन हमारे नेता विदेशों में जमा
करा आये, इस तरह हमारा धन बिना मेहनत किये, बिना सिर कटवाये, बिना संघर्ष किये विदेशी हाथों में
चला गया| और आज उसी काले धन के नाम पर नेतागण हमारी भावनाओं
का वोटों के रूप में दोहन कर फिर हमें बेवकूफ बनाने में तुले है| क्यों ? क्योंकि हम आज भी जागरूक नहीं कि जो जिला
कलेक्टर या पुलिस अधिकारी जिसे हम साहब कह कर पुकारते है वह जन-सेवक है, हमारे दिए कर से उसे वेतन मिलता है| वो नेताजी जो कल
तक हमसे वोट की भीख मांग रहे थे आज हम पर मंत्री, प्रधानमंत्री
बनकर शासन कर रहे है और हम उनके हाथ जोड़े अपने लिए खैरात की मांग करते है| ऐसा क्यों हो रहा है? जवाब सिर्फ एक ही कि हम जागरूक
नहीं| विदेशियों की गुलामी के खिलाफ हम जागरूक हुए लेकिन
अपने कथित जन-सेवकों को सत्ता देकर फिर सो गए और आज भुगत रहे है| हमारे से बाद में आजाद हुए हमारे सामने बेहद छोटे-छोटे देश विकास की दौड़
में हमसे आगे निकल गए|
हमारे जागरूक नहीं होने का इससे बड़ा उदाहरण और क्या
हो सकता है कि वर्ष 2005 में बने Right to information अर्थात सूचना के
अधिकार कानून का इस्तेमाल करना हम आज भी बहुत कम जानते है| जबकि
जो लोग जागरूक है और इस अधिकार का इस्तेमाल कर रहे है वे वाकई इस देश में अपने
आपको आजाद नागरिक समझते है और आजादी का सही मायने में लुफ्त उठाते है|
इसलिए यदि आप भी आजादी का सही मायने में लुफ्त उठाना
चाहते है और अपने मन में आजाद देश के आजाद नागरिक का भाव रखना चाहते है तो सूचना
के अधिकार अधिनियम का इस्तेमाल करते हुए सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों की समय-समय पर जांच
कीजिये| मात्र 10 रूपये सूचना पाने की फीस चुकाकर कलेक्टर के
भी कार्यालय के काम की ऐसे जांच करने जाईये जैसे कलेक्टर अन्य विभागों में उनके
काम का निरीक्षण करने जाता है|

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